माँ बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत और जिम्मेदार अनुभवों में से एक होता है। बच्चे के जन्म के साथ ही उसकी पूरी दिनचर्या बदल जाती है। अब हर छोटी-बड़ी बात में सबसे पहले बच्चे की सेहत का ध्यान आता है। यही वजह है कि इस समय महिलाएँ अपने खान-पान को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो जाती हैं।
गर्भावस्था के दौरान तो लगभग हर महिला यह सोच-समझकर खाती-पीती है कि कहीं किसी चीज़ का असर बच्चे पर न पड़े। लेकिन बच्चे के जन्म के बाद भी यह चिंता खत्म नहीं होती। फर्क सिर्फ इतना होता है कि अब बच्चा माँ के दूध पर पूरी तरह निर्भर होता है। ऐसे में माँ जो कुछ भी खाती या पीती है, उसे लेकर मन में यह सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है कि क्या इसका असर बच्चे तक भी पहुँच सकता है।
इन्हीं सवालों के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है—क्या स्तनपान कराने वाली महिला चाय पी सकती है? अगर पी सकती है, तो दिन में कितनी? क्या ज्यादा चाय पीने से बच्चे की नींद, स्वास्थ्य या विकास पर कोई असर पड़ सकता है? ऐसे सवाल लगभग हर नई माँ के मन में कभी न कभी जरूर आते हैं।
भारत में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ चाय केवल एक पेय नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। कई महिलाओं के लिए दिन की शुरुआत एक कप चाय से होती है और दिनभर की थकान भी अक्सर चाय की चुस्कियों के साथ ही दूर होती है। ऐसे में अचानक चाय छोड़ देना या इसकी मात्रा कम कर देना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।
यही कारण है कि जैसे ही कोई महिला स्तनपान कराना शुरू करती है, उसे अलग-अलग लोगों से अलग-अलग तरह की सलाह मिलने लगती है। कोई कहता है कि अब चाय बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए, तो कोई सीमित मात्रा में इसे सुरक्षित बताता है। इंटरनेट पर भी इस विषय से जुड़ी ढेर सारी जानकारी मौजूद है, लेकिन हर जगह एक जैसी बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर सही बात क्या है और किस सलाह पर भरोसा किया जाए।
अगर वैज्ञानिक शोधों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बात करें, तो सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। वास्तव में स्तनपान के दौरान चाय पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं होती। चिंता की बात चाय नहीं, बल्कि उसमें मौजूद कैफीन (Caffeine) होती है। यदि कैफीन का सेवन सीमित मात्रा में किया जाए, तो अधिकांश स्वस्थ स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए चाय पीना सुरक्षित माना जाता है। हालांकि, यदि दिनभर में जरूरत से ज्यादा चाय, कॉफी या अन्य कैफीन युक्त पेयों का सेवन किया जाए, तो कुछ शिशुओं पर इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है।
इसीलिए यह जानना जरूरी है कि सुरक्षित मात्रा क्या है, किन परिस्थितियों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए और कौन-सी आदतें माँ और बच्चे दोनों के लिए बेहतर मानी जाती हैं। इस लेख में हम वैज्ञानिक शोधों, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाओं की सिफारिशों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर विस्तार से समझेंगे कि स्तनपान के दौरान चाय पीना कितना सुरक्षित है, किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और किन परिस्थितियों में इसकी मात्रा कम करना बेहतर हो सकता है।
आखिर स्तनपान के दौरान चाय को लेकर इतनी चिंता क्यों की जाती है?
अगर आपने कभी किसी नई माँ से बात की हो, तो आपने जरूर देखा होगा कि बच्चे के जन्म के बाद उसे सबसे ज्यादा सलाह उसके खान-पान को लेकर ही मिलती है। कोई कहता है ठंडी चीजें मत खाओ, कोई मसालेदार भोजन से बचने की सलाह देता है, तो कई लोग यह भी कहते हैं कि अब चाय कम पीनी चाहिए। लेकिन क्या ये सलाह सिर्फ पुरानी मान्यताओं पर आधारित हैं, या इनके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी है? सही जवाब जानने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर चाय में ऐसा क्या होता है, जिसकी वजह से इसे लेकर इतनी चर्चा होती है।
दरअसल, चाय में प्राकृतिक रूप से कैफीन (Caffeine) नाम का एक पदार्थ पाया जाता है। यह एक प्रकार का उत्तेजक (Stimulant) होता है, जो हमारे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है। यही वजह है कि चाय पीने के बाद हमें ताजगी महसूस होती है, नींद कम आने लगती है और शरीर पहले की तुलना में अधिक सतर्क महसूस करता है। सुबह की एक कप चाय से दिन की शुरुआत करने की आदत भी इसी कारण बहुत से लोगों में होती है।
यहीं तक बात होती, तो शायद चिंता की कोई खास वजह नहीं थी। लेकिन जब कोई महिला स्तनपान करा रही होती है, तब स्थिति थोड़ी अलग हो जाती है। महिला द्वारा पी गई चाय में मौजूद कैफीन पहले उसके पाचन तंत्र से होकर रक्त में पहुँचती है। इसके बाद रक्त के माध्यम से इसकी बहुत ही थोड़ी-सी मात्रा स्तन के दूध तक भी पहुँच सकती है। यही बात कई लोगों की चिंता का कारण बनती है।
हालाँकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि माँ जितनी कैफीन पीती है, उतनी ही बच्चे तक भी पहुँच जाती है। वास्तव में ऐसा नहीं होता। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि माँ के शरीर में जाने वाली कैफीन का केवल बहुत छोटा हिस्सा ही स्तन के दूध में पहुँचता है। इसलिए यदि कोई महिला सामान्य और सीमित मात्रा में चाय पीती है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका बच्चा भी उतनी ही मात्रा में कैफीन प्राप्त कर रहा है।
फिर भी यह विषय पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने लायक नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि नवजात शिशु का शरीर अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। उसका लीवर (Liver) और मेटाबॉलिज्म (Metabolism) वयस्कों की तरह तेज़ी से काम नहीं करते। इसलिए यदि थोड़ी-सी कैफीन भी उसके शरीर में पहुँचती है, तो उसे बाहर निकलने में अपेक्षाकृत अधिक समय लग सकता है। इसी कारण कुछ छोटे शिशु कैफीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
हालाँकि, यह भी याद रखना जरूरी है कि हर बच्चे की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। कई महिलाएँ रोज़ सीमित मात्रा में चाय पीती हैं और उनके बच्चों में किसी तरह की कोई परेशानी दिखाई नहीं देती। वहीं कुछ शिशु ऐसे भी हो सकते हैं, जिन पर थोड़ी-सी अतिरिक्त कैफीन का असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई देने लगे। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी एक नियम को सभी माताओं और शिशुओं पर लागू नहीं करते।
इसीलिए आज की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान चाय को पूरी तरह छोड़ देने की सलाह नहीं देता। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण बात चाय पीना नहीं, बल्कि उसकी मात्रा, पूरे दिन में लिया गया कुल कैफीन और बच्चे की उम्र होती है। इन तीनों बातों को ध्यान में रखकर ही यह तय किया जा सकता है कि स्तनपान के दौरान चाय पीना सुरक्षित है या फिर उसकी मात्रा कम करने की जरूरत है।
हर एक कप चाय नुकसानदायक नहीं होता, लेकिन मात्रा का संतुलन सबसे ज़्यादा मायने रखता है
स्तनपान के दौरान चाय को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि इसे पूरी तरह नुकसानदायक मान लिया जाता है। जबकि वैज्ञानिक शोध कुछ और ही बताते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, अधिकांश स्वस्थ स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सीमित मात्रा में चाय पीना सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है। असली चिंता चाय पीने से नहीं, बल्कि पूरे दिन शरीर में जाने वाली कुल कैफीन (Total Caffeine Intake) की मात्रा से जुड़ी होती है।
यही वजह है कि डॉक्टर केवल यह नहीं पूछते कि आपने दिनभर में कितने कप चाय पी है। वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि पूरे दिन में आपने कैफीन किन-किन चीज़ों से ली है। दरअसल, कैफीन सिर्फ चाय में ही नहीं होती, बल्कि कॉफी, ग्रीन टी, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और कुछ दवाओं में भी पाई जाती है। ऐसे में अगर कोई महिला सुबह एक कप चाय पीती है, दोपहर में कॉफी लेती है, शाम को ग्रीन टी पीती है और बीच-बीच में चॉकलेट या एनर्जी ड्रिंक भी लेती है, तो उसे बिना एहसास हुए ही जरूरत से ज्यादा कैफीन मिल सकती है। इसीलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ हमेशा कपों की संख्या गिनने के बजाय पूरे दिन के कुल कैफीन सेवन पर ध्यान देने की सलाह देते हैं। क्योंकि यही तय करता है कि स्तनपान के दौरान कैफीन सुरक्षित सीमा में है या नहीं।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए दुनिया की कई प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थाएँ, जैसे Centers for Disease Control and Prevention (CDC), National Health Service (NHS) और American College of Obstetricians and Gynecologists (ACOG), यह मानती हैं कि स्तनपान कराने वाली अधिकांश महिलाओं के लिए प्रतिदिन लगभग 300 मिलीग्राम तक कैफीन का सेवन सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इससे भी कम मात्रा रखने की सलाह देते हैं, खासकर तब जब शिशु बहुत छोटा हो, समय से पहले जन्मा हो या कैफीन के प्रति अधिक संवेदनशील दिखाई देता हो।
अब यहाँ एक सवाल स्वाभाविक रूप से मन में आता है कि आखिर 300 मिलीग्राम कैफीन का मतलब कितनी चाय होता है? इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है, क्योंकि हर कप चाय में कैफीन की मात्रा एक जैसी नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करती है कि चायपत्ती कितनी डाली गई है, चाय कितनी देर तक उबाली गई है और कप का आकार कितना बड़ा है।
सामान्य तौर पर देखा जाए तो एक कप ब्लैक टी में लगभग 40 से 70 मिलीग्राम तक कैफीन हो सकती है, जबकि भारतीय शैली की दूध वाली चाय में यह मात्रा लगभग 30 से 60 मिलीग्राम के बीच रहती है। इसलिए हर कप चाय को समान मान लेना सही नहीं होगा। इन आँकड़ों को समझने के बाद यह कहना आसान हो जाता है कि यदि कोई महिला दिनभर में दो या तीन सामान्य आकार के कप चाय पीती है और साथ ही बहुत अधिक कॉफी या अन्य कैफीन युक्त पेयों का सेवन नहीं करती, तो अधिकांश मामलों में उसका कुल कैफीन सेवन सुरक्षित सीमा के भीतर ही रहता है।
हालाँकि, एक और बात का ध्यान रखना भी जरूरी है। हर व्यक्ति का शरीर कैफीन पर अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। कुछ महिलाओं को एक कप चाय से ही ताजगी महसूस होने लगती है, जबकि कुछ कई कप चाय पीने की आदी होती हैं। लेकिन स्तनपान का समय ऐसा होता है, जब अपनी पुरानी आदतों पर एक बार फिर से नज़र डालना समझदारी होती है। आखिर अब बात सिर्फ माँ की नहीं होती, बल्कि उस छोटे शिशु की भी होती है, जिसका शरीर अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। इसलिए इस समय संतुलित मात्रा में चाय पीना और पूरे दिन के कुल कैफीन सेवन पर ध्यान देना सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक तरीका माना जाता है।
वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं? स्तनपान और चाय पर हुए प्रमुख अध्ययनों की विस्तृत समीक्षा
अब तक हमने समझा कि स्तनपान के दौरान चाय पीने को लेकर चिंता का मुख्य कारण उसमें मौजूद कैफीन है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह चिंता केवल एक धारणा है या इसके पीछे वैज्ञानिक प्रमाण भी मौजूद हैं?
इसका जवाब जानने के लिए पिछले कई दशकों में दुनिया के अलग-अलग देशों में कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए। इन शोधों का उद्देश्य यह समझना था कि माँ द्वारा ली गई कैफीन कितनी मात्रा में स्तन के दूध तक पहुँचती है, क्या इसका शिशु पर कोई प्रभाव पड़ता है और यदि पड़ता है तो किन परिस्थितियों में। आइए इन महत्वपूर्ण अध्ययनों को एक-एक करके सरल भाषा में समझते हैं।
1. 1979 का पहला महत्वपूर्ण अध्ययन – Caffeine Secretion into Breast Milk
स्तनपान और कैफीन पर हुए सबसे शुरुआती और सबसे अधिक उद्धृत अध्ययनों में यह शोध शामिल है। इसे डॉ. E. E. Tyrala और डॉ. W. E. Dodson ने किया था। यह अध्ययन 1979 में Archives of Disease in Childhood जर्नल में प्रकाशित हुआ था (PMID: 507903)।
उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि माँ द्वारा पी गई चाय या कॉफी की कैफीन वास्तव में स्तन के दूध तक पहुँचती भी है या नहीं। इसी सवाल का वैज्ञानिक उत्तर खोजने के लिए यह अध्ययन किया गया।
इसके लिए शोधकर्ताओं ने पाँच स्तनपान कराने वाली महिलाओं को नियंत्रित मात्रा में कैफीन दी। इसके बाद अलग-अलग समय पर उनके रक्त और स्तन के दूध के नमूने लिए गए तथा दोनों में मौजूद कैफीन की मात्रा की तुलना की गई।
अध्ययन के नतीजे काफी महत्वपूर्ण थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि माँ के रक्त में मौजूद कैफीन वास्तव में स्तन के दूध तक पहुँचती है। हालांकि इसकी मात्रा सीमित रहती है और यह माँ के रक्त में मौजूद स्तर से कम होती है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि चाय या कॉफी पीने के लगभग 60 मिनट बाद दूध में कैफीन का स्तर सबसे अधिक था।
इस अध्ययन ने पहली बार वैज्ञानिक रूप से यह साबित किया कि कैफीन स्तन के दूध में पहुँचती तो है, लेकिन बहुत सीमित मात्रा में। यही निष्कर्ष आगे होने वाले कई अन्य अध्ययनों की आधारशिला बना।
2. 1984 का Pediatrics अध्ययन – माँ की कैफीन बच्चे तक कितनी पहुँचती है?
पहले अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों के सामने अगला सवाल था कि यदि कैफीन दूध तक पहुँचती है, तो उसकी मात्रा कितनी होती है और क्या उससे शिशु पर कोई प्रभाव पड़ता है। इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए डॉ. Charles M. Berlin Jr. और उनके सहयोगियों ने 1984 में Pediatrics जर्नल में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया।
इस शोध में स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अलग-अलग मात्रा में कैफीन युक्त पेय दिए गए। इसके बाद उनके रक्त, स्तन के दूध और लार के नमूनों का समय-समय पर विश्लेषण किया गया ताकि यह समझा जा सके कि शरीर में कैफीन किस तरह फैलती है और दूध तक पहुँचने में कितना समय लेती है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि चाय या कॉफी पीने के लगभग 1 से 2 घंटे के भीतर स्तन के दूध में कैफीन का स्तर सबसे अधिक होता है। हालांकि, दूध में पहुँचने वाली मात्रा फिर भी अपेक्षाकृत कम रहती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सामान्य मात्रा में कैफीन लेने वाली अधिकांश माताओं के शिशुओं में किसी स्पष्ट दुष्प्रभाव के प्रमाण नहीं मिले।
इस अध्ययन ने यह समझने में मदद की कि सीमित मात्रा में कैफीन लेने से अधिकांश स्वस्थ शिशुओं में गंभीर समस्या होने की संभावना बहुत कम होती है।
3. 1985 का Randomized Double-Blind अध्ययन – क्या अधिक कैफीन से बच्चे की नींद प्रभावित होती है?
इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि यदि कोई माँ अपेक्षाकृत अधिक कैफीन लेती है, तो क्या इससे शिशु की नींद, व्यवहार या हृदय गति पर असर पड़ सकता है। इसी उद्देश्य से डॉ. J. E. Ryu ने 1985 में Developmental Pharmacology and Therapeutics जर्नल में एक Randomized Double-Blind Study प्रकाशित की।
इस अध्ययन में 11 स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पाँच दिनों तक दो समूहों में बाँटा गया। एक समूह को डिकैफ कॉफी दी गई, जबकि दूसरे समूह को प्रतिदिन लगभग 500 मिलीग्राम कैफीन वाली कॉफी दी गई। इसके बाद शोधकर्ताओं ने बच्चों की हृदय गति, नींद, व्यवहार और स्तन के दूध में मौजूद कैफीन की मात्रा का विस्तार से मूल्यांकन किया।
अध्ययन के परिणाम दिलचस्प रहे। शोधकर्ताओं को बच्चों की 24 घंटे की हृदय गति और कुल नींद की अवधि में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस परिणाम का अर्थ यह नहीं है कि अधिक कैफीन पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने विशेष रूप से नवजात शिशुओं के मामले में सावधानी बरतने की सलाह दी, क्योंकि जन्म के शुरुआती महीनों में उनका लीवर और मेटाबॉलिज्म पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में यदि कैफीन उनके शरीर तक पहुँचती है, तो उसे बाहर निकलने में वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक समय लग सकता है।
यही कारण है कि आज भी अधिकांश स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्तनपान कराने वाली महिलाओं को चाय या कॉफी पूरी तरह छोड़ने की सलाह नहीं देते, बल्कि उसकी मात्रा संतुलित रखने और शिशु के व्यवहार पर ध्यान देने की सलाह देते हैं।
निष्कर्ष
स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए चाय पूरी तरह वर्जित नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि सीमित मात्रा में चाय का सेवन अधिकांश स्वस्थ माताओं और उनके शिशुओं के लिए सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है। इसलिए केवल यह सुनकर कि “चाय पीने से बच्चे को नुकसान होगा”, घबराने की आवश्यकता नहीं है। हालाँकि यह भी सच है कि किसी भी चीज़ की तरह चाय का अत्यधिक सेवन नुकसान पहुँचा सकता है। समस्या केवल चाय नहीं, बल्कि पूरे दिन में शरीर में जाने वाली कुल कैफीन की मात्रा है। यदि कैफीन आवश्यकता से अधिक हो जाती है, तो कुछ शिशुओं में बेचैनी, नींद की समस्या या चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, विशेष रूप से जीवन के शुरुआती महीनों में। इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि चाय का आनंद लें, लेकिन संतुलन बनाए रखें। अपने भोजन को पौष्टिक रखें, पर्याप्त पानी पिएँ और बच्चे के व्यवहार पर ध्यान दें। यदि सब कुछ सामान्य है, तो सामान्य मात्रा में चाय पीना अधिकांश मामलों में चिंता का कारण नहीं होता। अंततः हर माँ और हर शिशु अलग होता है। यदि आपको किसी भी बात को लेकर संदेह हो या बच्चे में असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो इंटरनेट की सलाह पर निर्भर रहने के बजाय अपने डॉक्टर या बाल रोग विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सामान्य मात्रा में चाय पीना अधिकांश स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। लेकिन यदि पूरे दिन में कैफीन की मात्रा बहुत अधिक हो जाए, तो कुछ मामलों में सावधानी बरतना जरूरी हो सकता है। विशेष रूप से यदि शिशु समय से पहले जन्मा हो, उसकी उम्र कुछ ही सप्ताह की हो, उसका वजन कम हो या वह किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा हो, तो डॉक्टर आमतौर पर कैफीन कम लेने की सलाह देते हैं। इसी तरह यदि कोई महिला दिनभर में कई कप कड़क चाय पीती है और साथ में कॉफी, ग्रीन टी, एनर्जी ड्रिंक या अन्य कैफीन युक्त चीज़ों का भी सेवन करती है, तो कुल कैफीन सुरक्षित सीमा से अधिक हो सकती है। इसलिए केवल चाय के कप गिनने के बजाय पूरे दिन के कुल कैफीन सेवन पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि माँ बहुत अधिक कैफीन का सेवन कर रही है, तो कुछ शिशुओं में बेचैनी, बार-बार जागना, सोने में कठिनाई या सामान्य से अधिक चिड़चिड़ापन जैसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं। हालाँकि, ये लक्षण केवल कैफीन की वजह से ही हों, ऐसा जरूरी नहीं है। गैस, भूख, संक्रमण या विकास के सामान्य चरण भी इसके कारण हो सकते हैं।
यदि आपको लगता है कि अधिक चाय या कॉफी पीने के बाद बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव आ रहे हैं, तो कुछ दिनों के लिए कैफीन कम करके देखें। अगर इसके बाद भी समस्या बनी रहती है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर रहेगा.
स्तनपान के दौरान केवल यह जानना ही जरूरी नहीं है कि कितनी चाय पीनी चाहिए, बल्कि कई बार यह भी मायने रखता है कि चाय कब पी जा रही है। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि संभव हो, तो चाय या अन्य कैफीन युक्त पेय बच्चे को स्तनपान कराने के तुरंत बाद पिएँ। इससे अगले स्तनपान तक शरीर में कैफीन का स्तर कुछ कम हो सकता है। हालांकि, यह कोई सख्त नियम नहीं है। यदि आपका शिशु स्वस्थ है और उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं दिखता, तो केवल समय को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती।
अधिकांश लोग कैफीन को केवल चाय और कॉफी से जोड़ते हैं, लेकिन यह कई दूसरी चीज़ों में भी मौजूद होती है। ग्रीन टी, ब्लैक कॉफी, इंस्टेंट कॉफी, कोल्ड कॉफी, कोला ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और कुछ प्रकार की चॉकलेट भी शरीर में कैफीन की मात्रा बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा कुछ दर्द निवारक और माइग्रेन की दवाओं में भी कैफीन मिलाई जाती है। इसलिए अपने कुल कैफीन सेवन का आकलन करते समय केवल चाय ही नहीं, बल्कि इन सभी स्रोतों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
यदि आपको कैफीन कम करने की सलाह दी गई है, तो अचानक चाय छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम करना बेहतर रहता है। इसकी जगह आप सादा पानी, नारियल पानी, बिना अतिरिक्त चीनी वाला नींबू पानी, छाछ या दूध जैसे पेय चुन सकती हैं। यदि हर्बल टी पीना चाहती हैं, तो पहले डॉक्टर से सलाह लेना उचित रहेगा, क्योंकि सभी हर्बल उत्पाद स्तनपान के दौरान सुरक्षित हों, ऐसा जरूरी नहीं है। शुरुआत में दिन की एक या दो कप चाय को किसी स्वस्थ पेय से बदलना सबसे आसान और व्यावहारिक तरीका माना जाता है।
यह एक आम धारणा है कि चाय पीने से माँ का दूध कम बनने लगता है। लेकिन अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक शोध इस बात की स्पष्ट पुष्टि नहीं करते। सामान्य मात्रा में चाय पीने से स्तन के दूध का उत्पादन सीधे कम होने के मजबूत प्रमाण नहीं मिले हैं। दूध बनने की प्रक्रिया मुख्य रूप से बच्चे के बार-बार स्तनपान करने, माँ के पोषण, पर्याप्त आराम, पानी के सेवन और तनाव जैसे कई अन्य कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए संतुलित मात्रा में चाय पीना आमतौर पर चिंता का कारण नहीं माना जाता।
यदि आपका शिशु समय से पहले जन्मा है, उसका वजन कम है या वह किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है, तो कैफीन की सुरक्षित मात्रा के बारे में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर रहता है। इसी तरह यदि कैफीन कम करने के बाद भी बच्चा लगातार कम सो रहा है, बहुत अधिक चिड़चिड़ा रहता है या उसके व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई देते हैं, तो बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। यदि माँ को भी अधिक कैफीन लेने के बाद धड़कन तेज होना, बेचैनी या अनिद्रा जैसी समस्याएँ महसूस हों, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित रहेगा।